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मंदिर मस्जिद बैर कराते मेल कराती मधुशाला | हरिवंश राय बच्चन जन्मदिन विशेष

हरिवंश राय बच्चन जन्मदिन विशेष | जानिए कुछ अनकही व अनसुनी बातें

जब कभी भी बात हिंदी साहित्य के उत्तर छायावाद काल की हो और नयी कविता की उत्थान की हो तो निश्चय ही एक ही नाम मन में उठता है
डॉ हरिवंश राय बच्चन |
27 नवम्बर 1907 को जन्मे प्रतापगढ़ के पास एक छोटे से गाँव का श्रीवास्तव परिवार का एक बच्चा हिंदी साहित्य इतिहास का सबसे प्रमुख नाम बनना अपने आप में एक सफ़र है जो आज भी नए लेखकों को उत्साह देता है कि लेखनी के दम पर पूरे विश्व में नाम कमाया जा सकता है |
हरिवंश जी से मेरी पहली मुलाक़ात “नीड़ का निर्माण फिर से ” कविता से हुई, उस समय शायद यह कविता समझ में नही आई उम्र कम होने के कारण लेकिन आज भी यह कविता हमेशा साथ चलती है |
मेरे बाबा जी के पुस्तकालय में एक किताब थी अलग अलग तरह के जिल्द और अलग अलग तरह से लेकिन नाम बस एक ही लिखा था “मधुशाला”
और यहाँ मिलना हुआ हमारा बच्चन साहब से |
मधुशाला यकीनन इसलिए पढना शुरू किया था क्यूंकि अमिताभ जी को इसका वाचन करते हुए देखा था | लेकिन इसको पढ़ने के बाद इस कविता या यूँ कह लें की “हालावाद ” से जो प्रेरणा मिली वो जीवनपर्यंत काम आएगी | उनकी हालावाद से प्रेरित प्रमुख कविता मधुशाला की कुछ पंक्तियाँ

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।

प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।

प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३

 

बच्चन साहब को लेखन पड़ने लिखने की उम्र से ही पसंद था, उसी के फल स्वरुप उन्होने फ़ारसी के प्रसिद्ध कवि ‘उमर ख्य्याम की रुबाईयों का हिन्दी में अनुवाद किया , फिर क्या था बन गये वो उस समय युवाओ में प्रसिद्ध | और उसी उत्साह में उन्होंने अपनी कुछ सबसे बेहतरीन रचनाएँ रचित कर दी | मधुशाला, मधुबाला , मधुकलश आदि में संग्रहित हैं वो रचनाएं |

समय के साथ साथ इनकी रचनाओं में प्रेरणा और प्रोत्साहन दिखने लगा जिसके फलस्वरूप अग्निपथ , नीड़ का निर्माण फिर फिर व अनेकों रचनाओं को इन्होने दुनिया से मुखातिब कराया |

वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी,
माँग मत, माँग मत, माँग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु स्वेद रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

 

 

कहा जाता है कि एक नवम्बर १९८४ उनकी आखिरी कविता थी जो कि इंदिरा गांधी जी की हत्या के बाद लिखी गयी थी उसी सन्दर्भ में |
इस महान लेखक व रचनाकार को अनेक सम्मान व पुरुस्कारों से नवाज़ा गया है |

९५ बसंत देखने के बाद २००३/१८/जनवरी को उनका देहावसान हुआ और हिंदी साहित्य का ये दिया हमेशा के लिए बुझ गया |

ओ गगन के जगमगाते दीप!
दीन जीवन के दुलारे
खो गये जो स्वप्न सारे,
ला सकोगे क्या उन्हें फिर खोज हृदय समीप?
ओ गगन के जगमगाते दीप!

यदि न मेरे स्वप्न पाते,
क्यों नहीं तुम खोज लाते
वह घड़ी चिर शान्ति दे जो पहुँच प्राण समीप?
ओ गगन के जगमगाते दीप!

यदि न वह भी मिल रही है,
है कठिन पाना-सही है,
नींद को ही क्यों न लाते खींच पलक समीप?
ओ गगन के जगमगाते दीप!

 

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